विंजिंहम पोर्ट बना पर्यावरण और विकास का मॉडल, झारखंड के उद्योगों के लिए सीख

रांची
झारखंड की ही तरह केरल भी हरे भरे जंगलों से भरा है। अरब सागर के किनारे केरलम के शहर त्रिवेंद्रम से 40 किलोमीटर की दूरी पर अडानी विंजिंहम समुद्र परिवहन परियोजना एक रोल मॉडल है।
झारखंड में खनन और उद्योग दोनों में पर्यावरण और विस्थापन का सवाल उभर कर सामने आता है। लेकिन विंजिंहम सी पोर्ट यानि बंदरगाह के निर्माण में कम से कम विस्थापन हुआ और समुद्र के आसपास की पारिस्थितिकी को बग़ैर कोई नुकसान पहुंचाए तीन किलोमीटर लंबी दीवार खड़ी कर दी गई।
इसका परिणाम यह है कि भारत आने वाले बड़े जहाजों को अब सामान उतारने के लिए दुबई, कोलंबो, सिंगापुर या एमस्टडर्म नहीं जाना पडता है। देश को हजारों करोड़ का राजस्व मिलता है और 20 हजार से अधिक लोगों को रोजगार मिला है। झारखंड में नए लगने वाले उद्योगों को इस मॉडल के जरिए पर्यावरण ऑडिट के जरिए अर्थव्यवस्था में योगदान करने वाला बनाया जा सकता है।
कोयला परिवहन में परिवहन का माडल है उपयोगी
झारखंड में कोयला, लौह और बाक्साइट खनन के बाद उनका परिवहन वन क्षेत्र से ही होता है। विंजिंहम सी पोर्ट ऐसे तो समुद्र में संचालित होता है लेकिन 18 मीटर की गहराई होने की वजह से जल के अंदर एक पूरा वनस्पति और जीव तंत्र रहता है।
इसकी डिजिटल मैपिंग कर यह सुनिश्चित किया जाता है कि किसी वनस्पति और जीव जंतु को नुकसान नहीं पहुंचे। इसी तरह खनिजों के परिवहन में भी डिजिटल सेंसिंग उपकरणों का प्रयोग हो सकता है।
2028 तक समुद्री व्यापार को तीन गुणा बढ़ाएगा विंजिंहम
1विंजिंहम सी पोर्ट अभी पहले ही चरण में है। तीन किलोमीटर के बैक वाटर में अभी 40 मीटर तक के जहाज पहुंच रहे हैं। खास बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा ये इस बंदरगाह की दूरी मात्र 10 नाटिकल मील है। लेकिन बंदरगाह बन जाने के बाद यहां अंतरराष्ट्रीय और भारतीय जहाज आधे घंटे में पहुंच सकते हैं।
2028 तक बैक वाटर की लंबाई चार किलोमीटर तक हो जाएगी। इससे यहां एक समय में एक लाख तक कंटेनर रखे जा सकेंगे। अभी यहां 35 हजार कंटेनर रखे जा रहे हैं।
पूरी तरह ऑटोमैटिक है कंटेनर का उतार-चढ़ाव
विंजिंहम सी पोर्ट पर तीस से अधिक उच्च क्षमता के क्रेन लगे हैं। इनका संचालन पूरी तरह से ऑटोमैटिक है जो कंट्रोल रूम में एक सॉफ्टवेयर सिस्टम के जरिए होता है। कोयला और लौह अयस्क परिवहन में कन्वेयर बेल्ट को इस तकनीक से संचालित करने पर प्रदूषण की संभावना कम होगी।
पहले भारत का 75 प्रतिशत कंटेनर देश गये बाहर उतरता था
विंजिंहम सी पोर्ट के संचालित होने से पहले भारत का 75 प्रतिशत समुद्री कंटेनर परिवहन दूसरे देशों से होता था। देश में 17 मीटर से अधिक गहराई को कोई बड़ा पोर्ट नहीं था। अब देश में भी इतनी गहराई की क्षमता का पोर्ट बन जाने से कंटेनर यहीं उतर रहे हैं।



