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सिंधु जलसंधि पर भारत का बड़ा दांव, चिनाब-ब्यास पर शुरू होंगे स्पेशल प्रोजेक्ट; पाकिस्तान को नहीं मिलेगा पानी

नई दिल्ली

केंद्र सरकार इस साल 1 अगस्त से अपने सबसे महत्वाकांक्षी नदी जोड़ो (रिवर लिंकिंग) प्रोजेक्ट्स में से एक पर काम शुरू करने जा रही है. करीब 2,300 करोड़ रुपये की लागत वाले इस प्रोजेक्ट को 31 जुलाई 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है. इसके तहत चिनाब नदी के अतिरिक्त पानी को ब्यास नदी बेसिन में मोड़ा जाएगा. पिछले हफ्ते ही सीएनएन-न्यूज18 ने सबसे पहले इस रणनीतिक परियोजना की जानकारी दी थी. अब चैनल को इस प्रोजेक्ट का विस्तृत ब्लूप्रिंट भी मिला है। 

एनएचपीसी (NHPC) के एक दस्तावेज के अनुसार, ‘लिंक-3 प्रोजेक्ट’ हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले की लाहौल घाटी में चिनाब नदी पर प्रस्तावित है. इस योजना के तहत चिनाब नदी पर 19 मीटर ऊंचा बैराज बनाया जाएगा. इसके साथ एक इंटेक स्ट्रक्चर और करीब 8.7 किलोमीटर लंबी जल परिवहन सुरंग (टनल) का निर्माण किया जाएगा. परियोजना के दूसरे चरण में जलविद्युत उत्पादन की भी संभावना रखी गई है। 

पहाड़ों के बीच बनेगा बैराज
दस्तावेज में बताया गया है कि प्रस्तावित बैराज के आसपास का इलाका बेहद दुर्गम और पहाड़ी है. यहां चिनाब नदी एक चौड़ी यू-आकार की घाटी से होकर बहती है. क्षेत्र की ऊंचाई लगभग 3,095 मीटर से लेकर 6,517 मीटर तक है और यहां तीखी पर्वत श्रृंखलाएं तथा गहरी घाटियां मौजूद हैं। 

सिंधु की लाइफलाइन है चिनाब का पानी
करीब 8.7 किलोमीटर लंबी यह सुरंग चिनाब बेसिन के अतिरिक्त पानी को ब्यास नदी प्रणाली में पहुंचाएगी. इस परियोजना को पाकिस्तान के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि चिनाब सिंधु जल संधि के तहत पश्चिमी नदियों में शामिल है, जिन पर भारत के अधिकार सीमित रहे हैं. हालांकि, पिछले वर्ष पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने इस संधि को लेकर अपना रुख कड़ा कर लिया था। 

पानी मोड़ने का प्रस्तावित स्थल कोस्कर गांव के पास स्थित है और यह अटल टनल रोहतांग के उत्तरी छोर से आगे पड़ता है. इस परियोजना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि यह सिर्फ एक इंजीनियरिंग या जलविद्युत परियोजना नहीं है, बल्कि पश्चिमी नदियों के पानी के बेहतर उपयोग की दिशा में एक बड़ा कदम है। 

तो पाकिस्तान नहीं जाएगा चिनाब का पानी
भारतीय नीति निर्माताओं और जल विशेषज्ञों का लंबे समय से मानना रहा है कि पश्चिमी नदियों का काफी पानी पर्याप्त भंडारण और बुनियादी ढांचे की कमी के कारण बिना इस्तेमाल हुए पाकिस्तान की ओर बह जाता है. चिनाब-ब्यास लिंक परियोजना को इसी समस्या के समाधान के रूप में देखा जा रहा है। 

इस प्रस्तावित बैराज के आसपास का इलाका बेहद दुर्गम और पहाड़ी है.
सरकार को उम्मीद है कि इस परियोजना से उत्तर भारत में जलविद्युत उत्पादन की संभावनाएं भी मजबूत होंगी. अधिकारियों के मुताबिक, दूसरे चरण में पानी के इस नए प्रवाह का उपयोग बिजली उत्पादन के लिए किया जा सकता है। 
हिमालयी नदियों को भारत की सबसे बड़ी नवीकरणीय ऊर्जा संपत्तियों में गिना जाता है. ऐसे समय में जब देश थर्मल पावर पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है, यह परियोजना ऊर्जा और जल प्रबंधन दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। 

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